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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करना भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा था। अनुच्छेद 370 जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देता था, जिसके  तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून राज्य सरकार की मंजूरी के बिना लागू नहीं किए जा सकते थे। अपनी चुनावी जीत के दो महीने बाद, भाजपा सरकार ने संसद में दो प्रस्ताव पेश किए, जिनमें से कोई भी अनुच्छेद 370 को रद्द नहीं करता था और फिर भी राज्य की विशेष स्थिति को प्रभावी ढंग से समाप्त करता था | उसने ऐसा बिना किसी संवैधानिक संशोधन पारित किए ही कर दिया, जिसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती। 



मोदी सरकार ने वास्तव में इसे कैसे कर लिया?

इसका उत्तर वास्तव में कुछ ऐसा है जो हुआ वो संसद के बाहर हुआ न कि भीतर। सबसे पहले गृह मंत्री अमित शाह ने अनुच्छेद 370 को खोखला करने का प्रस्ताव पेश किया, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 367 में संशोधन के लिए एक राष्ट्रपति का आदेश जारी किया गया।

इसे संसद के एक अधिनियम के बजाय एक आदेश के माध्यम से कैसे संशोधित किया गया था? हम उस पर बाद में पहुंचेंगे। सबसे पहले अनुच्छेद 367 को समझना जरूरी है।

अनुच्छेद 367 एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है, यह कुछ कानूनों की व्याख्या करने में मदद करता है। यदि आप अनुच्छेद 367 को बदलने में सक्षम हैं, तो कुछ मामलों में आप अन्य प्रावधानों को सीधे ऐसा किए बिना बदल सकते हैं, क्योंकि आप केवल उनकी व्याख्या बदलते हैं| 

यह अनुच्छेद, राष्ट्रपति का आदेश जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू प्रावधानों की व्याख्या करने में लिए एक नया खंड जोड़ता है। यह खंड अनुच्छेद 370 की व्याख्या को बदल देता है, अनुच्छेद 370 के खंड 3 के नियम में "संविधान सभा" शब्दों को "विधान सभा" के साथ बदल देता है।

अनुच्छेद 370 के खंड 3 स्पष्ट करता था कि यदि राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 के भीतर कुछ भी बदलना चाहते हैं, तो उन्हें जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश की आवश्यकता है। लेकिन जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को 1957 में भंग कर दिया गया था, इसलिए यह संभवतः एक सिफारिश नहीं दे सका।

राष्ट्रपति के आदेश ने शब्द "संविधान सभा" के बजाय "विधान सभा" बदल दिया।

फिर भी, यह खंड कहता है कि राष्ट्रपति को विधान सभा की मंजूरी मिलती है - लेकिन जम्मू और कश्मीर के पास अभी एक नहीं है, क्योंकि इसे 2018 में भंग कर दिया गया था और पहले राज्यपाल शासन और बाद में राष्ट्रपति शासन के साथ बदल दिया गया था। तो सरकार इसके आसपास कैसे पहुंची?

जब कोई राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन होता है, तो राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति भारतीय संसद में निहित होती है। जम्मू-कश्मीर में उस समय राष्ट्रपति शासन था। 


संविधान में संशोधन

अब हम शुरुआत के सवाल पर वापस आते हैं: क्या भारतीय संविधान, जम्मू और कश्मीर पर लागू होने के प्रयोजनों के लिए, राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति के आदेश का उपयोग करके संशोधित किया जा सकता है? क्या संसद में इसके पक्ष में दो-तिहाई मतदान के साथ संविधान संशोधन विधेयक की आवश्यकता नहीं होगी?

इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट ने 1961 में पूरनलाल लखनपाल बनाम भारत के राष्ट्रपति और अन्य मामले में अपने फैसले में दिया था। अदालत ने कहा कि "संशोधन" शब्द जैसा कि अनुच्छेद 370 (1) में प्रकट होता है, राष्ट्रपति को भारतीय संविधान के प्रावधानों में पर्याप्त संशोधन करने की शक्ति देता है जो जम्मू और कश्मीर पर लागू होते हैं।

भारतीय कानून की इस विचित्रता का मतलब है कि संविधान को वास्तव में बिना संवैधानिक संशोधन के ही बदला जा सकता है, जब तक कि यह केवल जम्मू और कश्मीर से संबंधित है।

किए गए बदलाव केवल जम्मू और कश्मीर पर लागू होते हैं, न कि देश के अन्य हिस्सों पर, क्योंकि राष्ट्रपति का ऐसा आदेश वास्तव में जम्मू-कश्मीर के संविधान में शामिल है। राज्य अपने स्वयं के संविधान द्वारा शासित होता है जिस पर समय-समय पर भारतीय संविधान के प्रावधान लागू होते हैं।

एक अंतिम प्रश्न उठ सकता है। यदि संविधान, जैसा कि जम्मू-कश्मीर पर लागू होता है, संसद में संविधान संशोधन विधेयक के बिना बदला जा सकता है, तो अनुच्छेद 370 को बदलने के लिए उस पद्धति का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि इस संवैधानिक विचित्रता का एक अपवाद यह है कि इसका उपयोग सीधे अनुच्छेद 370 को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता है, केवल अन्य प्रावधानों को।

या दूसरे शब्दों में, सरकार ने अनुच्छेद 367 को बदलने के लिए अनुच्छेद 370 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल किया, जिसने तब, अनुच्छेद 370 को खोखला करने की अनुमति दी।

Reference: https://web.archive.org/web/20190806044000/https://scroll.in/article/932917/j-k-special-status-how-the-modi-government-used-article-370-to-kill-article-370


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