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भारतीय संविधान की अनुच्छेद - 370 के तहत जम्मू -कश्मीर राज्य को भारत में अन्य राज्यों में मुकाबले विशेष अधिकार दिया गया था, अनुच्छेद 370 एक ऐसा अनुच्छेद था जो जम्मू और कश्मीर को स्वयं शासन प्रदान करता था, जिसे संविधान के भाग - 21 के तहत दर्ज किया गया था | अनुच्छेद - 370 को भारतीय संविधान में भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह के बीच हुए समझौते के बाद जोड़ा गया था | अनुच्छेद - 370 को 26 जनवरी 1957 में लागू किया गया था | अनुच्छेद 370 के अनुसार भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर के मामले में केवल 3 ही क्षेत्रों में (रक्षा, विदेश, और संचार) में ही क़ानून बना सकता था | इसके अलावा दूसरे किसी भी क़ानून को लागू करने के लिए राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी थी | 

भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में एक ऐतिहासिक जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 पेश किया, जिसमें जम्मू कश्मीर राज्य से संविधान का अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य का विभाजन जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख के दो केंद्र शासित क्षेत्रों के रूप में करने का प्रस्ताव किया गया । जम्मू कश्मीर केंद्र शासित क्षेत्र में अपनी विधायिका होगी जबकि लद्दाख बिना विधायी वाली केंद्रशासित क्षेत्र होगा।



अनुच्छेद - 370 के विशेष अधिकार 

  1. अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये।
  2. इसी विशेष दर्ज़े के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती।
  3. इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
  4. 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
  5. इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते।
  6. भारतीय संविधान की धारा 370 जिसके अन्तर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
  7. जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय करना ज़्यादा बड़ी ज़रूरत थी और इस काम को अंजाम देने के लिये धारा 370 के तहत कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को उस समय दिये गये थे। ये विशेष अधिकार निचले अनुभाग में दिये जा रहे हैं।




अनुच्छेद 370 का विरोध

इस अनुच्छेद का विरोध नेहरू के दौर में ही कांग्रेस पार्टी में होने लगा था।

संविधान निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री भीमराव आम्बेडकर अनुच्‍छेद 370 के विरोधी थे। उन्‍होंने इसका मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करने से मना कर दिया था। आंबेडकर के मना करने के बाद शेख अब्‍दुल्‍ला, नेहरू के पास पहुंचे और नेहरू के निर्देश पर एन. गोपालस्‍वामी अयंगर ने मसौदा तैयार किया था।

प्रकाशवीर शास्त्री ने अनुच्छेद 370 को हटाने का एक प्रस्ताव 11 सितम्बर, 1964 को संसद में पेश किया था। इस विधेयक पर भारत के गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने 4 दिसम्बर, 1964 को जवाब दिया। सरकार की तरफ से आधिकारिक बयान में उन्होंने एकतरफा रुख अपनाया। जब अन्य सदस्यों ने इसका विरोध किया तो नन्दा ने कहा, "यह मेरा सोचना है, अन्यों को इस पर वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।" गुलजारी लाल नंदा, पूरी चर्चा में अनुच्छेद 370 के विषय को टालते रहे। वे बस इतना ही कह पाए कि विधेयक में कुछ क़ानूनी कमियां हैं। जबकि इसमें सरकार की कमजोरी साफ़ दिखाई दे रही थी | 

भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने शुरू से ही अनुच्छेद 370 का विरोध किया। उन्होने इसके खिलाफ लड़ाई लड़ने का भी बीड़ा उठाया था। उन्होंने कहा था कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस कानून के खिलाफ भूख हड़ताल भी किये थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जब इसके खिलाफ आन्दोलन करने के लिए जम्मू-कश्मीर गए तो उन्हें वहां घुसने नहीं दिया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान ही उनकी रहस्यमत ढंग से मृत्यु हो गई।

हिन्दू महासभा, भारतीय जनसंघ, भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना शुरू से ही इसे हटाने की मांग करते आये हैं। अन्ततः यह अनुच्छेद अगस्त 2019 में समाप्त कर दी गयी।





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