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    तेरे गिरने में तेरी हार नहीं
    तू इंसान है, अवतार नहीं
    गिर, उठ, चल, दौड़ फिर भाग
    क्यूंकि
    जीवन संक्षिप्त है
    इसका कोई सार नहीं…

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    यूँ ही नहीं मिलती राही को मंजिल,
    एक जूनून सा दिल में जगाना होता है,
    पूँछा चिड़िया से कैसे बनाया आशियाना बोली –
    भरनी पड़ती है उड़ान बार बार,
    तिनका तिनका उठाना होता है

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    नौकरी की, लिखी नज़्में,
    सुकूँ पाया न गया
    शहर ए दिल तुझ को
    किसी तौर बसाया न गया


    - हमराम हुसैन आज़ाद
    एक शमशान के बहार लिखा था....

    मंजिल तो तेरी यही थी, बस....
    जिन्दगी गुजर गयी तेरी आते-आते....
    क्या मिला तुझे इस दुनिया से.... ???
    अपनों ने ही जला दिया तुझे जाते-जाते.... !!!

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